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    Sodalite Wati Bracelet 4 mm – Remedywala
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    हनुमान स्तवन स्तोत्र भगवान हनुमान की महिमा का गान करते हुए उनके असीम बल, बुद्धिमत्ता, निष्ठा और सेवा भाव की सराहना करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, शक्ति, और जीवन के कठिन मार्गों पर विजय प्राप्त होती है।

    भगवान हनुमान की पूजा करने से व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है, तथा जीवन में आने वाली कठिनाइयों और संकटों से उबारने की शक्ति मिलती है। यही कारण है कि यह स्तोत्र पूरी दुनिया में भगवान हनुमान के भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ पाठ किया जाता है।

    स्तोत्र

    अर्थ

    प्रनवउं पवनकुमार खल बन पावक ज्ञानघन।
    जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
    मैं उन पवन पुत्र को नमन करता हूं, जो दुष्टों को भस्म करने के लिए अग्नि के समान हैं। जो अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाले हैं, जिसके हृदय में धनुष-बाण धारण करने वाले प्रभु श्री राम निवास करते हैं।
    अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं।
    दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्॥
    सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
    रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
     मैं उन पवन पुत्र को प्रणाम करता हूं, जो अथाह शक्ति के स्वामी हैं। जो सोने के पहाड़ की तरह चमकने वाले शरीर, दानव जाति के जंगल को भस्म करने के लिए अग्नि के समान, बुद्धिमानों में सबसे प्रमुख और सभी गुणों को धारण करने वाले हैं और जो प्रभु श्री राम के सबसे प्रिय भक्त हैं।
    गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्।
    रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम्॥
    मैं उन हनुमान जी की पूजा करता हूं, जिन्होंने समुद्र को गाय के खुर के समान बना दिया। जिन्होंने विशाल राक्षसों को मच्छरों की तरह नाश किया और जो “रामायण” नामक माला के मोतियों के बीच एक रत्न की तरह हैं।
    अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
    कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥
    मैं अंजनी के वीर पुत्र और माता जानकी के दुखों को दूर करने वाले, वानरों के स्वामी, लंका के अक्षकुमार (रावण के पुत्र) का वध करने वाले हनुमान जी की पूजा करता हूं।
    उलंघ्यसिन्धों: सलिलं सलीलं य: शोकवह्नींजनकात्मजाया:।
    आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम्॥
    मैं अंजनी के पुत्र को नमन करता हूं, जिसने समुद्र में छलांग लगा जनक की पुत्री के शोक रूपी अग्नि से लंका को जला दिया, मैं उन अंजनी पुत्र को नमस्कार करता हूं।
    मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
    वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
    मैं रामदूत हनुमान जी जी के चरणों में शरण लेता हूं, जो मन और वायु के समान तेज हैं, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है, जो ज्ञानियों में सबसे श्रेष्ठ हैं, जो वानरों के समूह के प्रमुख हैं और जो श्री राम के दूत हैं।
    आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीय विग्रहम्।
    पारिजाततरूमूल वासिनं भावयामि पवमाननंदनम्॥
    मैं उन हनुमान जी का ध्यान करता हूं, जिनका चेहरा सुर्ख है और जिनका शरीर सोने के पहाड़ की तरह चमकता है, जो सभी वरदानों को प्रदान कर सकते हैं और सभी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और जो पारिजात वृक्ष के नीचे रहते हैं।
    यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृत मस्तकाञ्जिंलम।
    वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं राक्षसान्तकाम्॥
    मैं उन हनुमान जी को नमन करता हूं, जो जहां भी राम के नाम का जप किया जाता है वहां श्रद्धा से झुकते हैं, जिनकी प्रेम के आंसुओं से भरी आंखें हैं और जो पूजा में सिर झुकाते हैं, जो राक्षसों के संहारक के रूप में जाने जाते हैं।

    ॥ इति श्री हनुमान स्तवन स्तोत्र॥

    • भक्त पर हनुमान जी की विशेष कृपा बनी रहती है।
    • भक्त के ऊपर कभी भी किसी भी प्रकार की मुसीबत नहीं आती है।
    • भूत-प्रेत की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
    • सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है एवं स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से मुक्ति मिलती है।
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    भगवान हनुमान की पूजा करने से व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है, तथा जीवन में आने वाली कठिनाइयों और संकटों से उबारने की शक्ति मिलती है। यही कारण है कि यह स्तोत्र पूरी दुनिया में भगवान हनुमान के भक्तों द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ पाठ किया जाता है।

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    अर्थ

    प्रनवउं पवनकुमार खल बन पावक ज्ञानघन।
    जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
    मैं उन पवन पुत्र को नमन करता हूं, जो दुष्टों को भस्म करने के लिए अग्नि के समान हैं। जो अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने वाले हैं, जिसके हृदय में धनुष-बाण धारण करने वाले प्रभु श्री राम निवास करते हैं।
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    सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
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    गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्।
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    मैं उन हनुमान जी की पूजा करता हूं, जिन्होंने समुद्र को गाय के खुर के समान बना दिया। जिन्होंने विशाल राक्षसों को मच्छरों की तरह नाश किया और जो “रामायण” नामक माला के मोतियों के बीच एक रत्न की तरह हैं।
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    उलंघ्यसिन्धों: सलिलं सलीलं य: शोकवह्नींजनकात्मजाया:।
    आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम्॥
    मैं अंजनी के पुत्र को नमन करता हूं, जिसने समुद्र में छलांग लगा जनक की पुत्री के शोक रूपी अग्नि से लंका को जला दिया, मैं उन अंजनी पुत्र को नमस्कार करता हूं।
    मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
    वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
    मैं रामदूत हनुमान जी जी के चरणों में शरण लेता हूं, जो मन और वायु के समान तेज हैं, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है, जो ज्ञानियों में सबसे श्रेष्ठ हैं, जो वानरों के समूह के प्रमुख हैं और जो श्री राम के दूत हैं।
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    ॥ इति श्री हनुमान स्तवन स्तोत्र॥

    • भक्त पर हनुमान जी की विशेष कृपा बनी रहती है।
    • भक्त के ऊपर कभी भी किसी भी प्रकार की मुसीबत नहीं आती है।
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