Menu

Navigation

  • HOME
  • ENERGY VASTU
  • BRACELETS
  • PENDANTS
  • RUDRAKSHA
  • 199 Store
  • Pyrite and Smoky Quartz Combination Bracelet 8mm
    Pyrite and Smoky Quartz Combination Bracelet 8mm
    ₹1099₹646
    Shop Now
    7 Mukhi Rudraksha Bracelet
    7 Mukhi Rudraksha Bracelet
    ₹2099₹1099
    Shop Now
    Rose Quartz Oval Shape Wire Wrapped Pendant
    Rose Quartz Oval Shape Wire Wrapped Pendant
    ₹1099₹601
    Shop Now
    Rose Quartz Bracelet (Diamond Cut Tumble)
    Rose Quartz Bracelet (Diamond Cut Tumble)
    ₹2099₹899
    Shop Now
    Green Moonstone Bracelet
    Green Moonstone Bracelet
    ₹2199₹1052
    Shop Now
    Black Matte & Hematite Combination Bracelet Double Layer 8mm
    Black Matte & Hematite Combination Bracelet Double Layer 8mm
    ₹1099₹655
    Shop Now

    देवनागरी में :श्रीमदाञ्जनेयभुजङ्गप्रयातस्तोत्रम्

    संस्कृत-रोमन में : Shrīmad Anjaneya Bhujanga Prayāta Stotram

    इसे लोकप्रिय रूप में “आञ्जनेय भुजङ्ग स्तोत्रम्” या “हनुमत् भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम्” भी कहा जाता है

    Hanuman Bhujanga Stotram

    🧠 1. रचयिता एवं समय

    • परंपरागत रूप से इसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है
    • हालांकि, यह शंकर की मुख्य रचनाओं की सूची में नहीं मिलता, अतः कुछ विद्वान इसे उनके अप्रचलित ग्रंथों में से मानते हैं

    🏞 2. रचना‑परिस्थिति की कथा

    • एक किंवदंती अनुसार शंकराचार्य जब तिरुचेंदुर स्थित Subrahmanya (मुरुगन) मंदिर गए थे, तब दो साँपों ने उन्हें जकड़ लिया।
    • उस समय उन्होंने तत्काल इस स्तोत्र की रचना की — दो श्लोकों का जाप करते ही साँप उतर गए और एक मंदिर के भीतर गायब हो गया

    📜 3. स्तोत्र का स्वरूप

    –  यह भुजंग‑छंद  में लिखा गया है — “भुजङ्गप्रयात” नाम इसी छंद से जुड़ा है

    –  इसमें लगभग 19 श्लोक होते हैं, जिनमें हनुमान जी के दिव्य रूप, शक्ति और भक्तिमय गुणों का स्तवन है

     ॥ आञ्जनेय भुजङ्ग स्तोत्रम् ॥

    प्रपन्नानुरागं प्रभाकाञ्चनाभं
    जगद्भीतिशौर्यं तुषाराद्रिधैर्यम् ।
    तृणीभूतहेतिं रणोद्यद्विभूतिं
    भजे वायुपुत्रं पवित्राप्तमित्रम् ॥ १ ॥

    भजे पावनं भावनानित्यवासं
    भजे बालभानु प्रभाचारुभासम् ।
    भजे चन्द्रिकाकुन्द मन्दारहासं
    भजे सन्ततं रामभूपाल दासम् ॥ २ ॥

    भजे लक्ष्मणप्राणरक्षातिदक्षं
    भजे तोषितानेक गीर्वाणपक्षम् ।
    भजे घोरसङ्ग्राम सीमाहताक्षं
    भजे रामनामाति सम्प्राप्तरक्षम् ॥ ३ ॥

    कृताभीलनादं क्षितिक्षिप्तपादं
    घनक्रान्त भृङ्गं कटिस्थोरु जङ्घम् ।
    वियद्व्याप्तकेशं भुजाश्लेषिताश्मं
    जयश्री समेतं भजे रामदूतम् ॥ ४ ॥

    चलद्वालघातं भ्रमच्चक्रवालं
    कठोराट्टहासं प्रभिन्नाब्जजाण्डम् ।
    महासिंहनादा द्विशीर्णत्रिलोकं
    भजे चाञ्जनेयं प्रभुं वज्रकायम् ॥ ५ ॥

    रणे भीषणे मेघनादे सनादे
    सरोषे समारोपिते मित्रमुख्ये ।
    खगानां घनानां सुराणां च मार्गे
    नटन्तं वहन्तं हनूमन्त मीडे ॥ ६ ॥

    कनद्रत्न जम्भारि दम्भोलिधारं
    कनद्दन्त निर्धूतकालोग्र दन्तम् ।
    पदाघातभीताब्धि भूतादिवासं
    रणक्षोणिदक्षं भजे पिङ्गलाक्षम् ॥ ७ ॥

    महागर्भपीडां महोत्पातपीडां
    महारोगपीडां महातीव्रपीडाम् ।
    हरत्याशु ते पादपद्मानुरक्तो
    नमस्ते कपिश्रेष्ठ रामप्रियोयः ॥ ८ ॥

    जराभारतो भूरि पीडां शरीरे
    निराधारणारूढ गाढ प्रतापी ।
    भवत्पादभक्तिं भवद्भक्तिरक्तिं
    कुरु श्रीहनूमत्प्रभो मे दयालो ॥ ९ ॥

    महायोगिनो ब्रह्मरुद्रादयो वा
    न जानन्ति तत्त्वं निजं राघवस्य ।
    कथं ज्ञायते मादृशे नित्यमेव
    प्रसीद प्रभो वानरेन्द्रो नमस्ते ॥ १० ॥

    नमस्ते महासत्त्ववाहाय तुभ्यं
    नमस्ते महावज्रदेहाय तुभ्यम् ।
    नमस्ते परीभूत सूर्याय तुभ्यं
    नमस्ते कृतामर्त्य कार्याय तुभ्यम् ॥ ११ ॥

    नमस्ते सदा ब्रह्मचर्याय तुभ्यं
    नमस्ते सदा वायुपुत्राय तुभ्यम् । 
    नमस्ते सदा पिङ्गलाक्षाय तुभ्यं
    नमस्ते सदा रामभक्ताय तुभ्यम् ॥ १२ ॥

    हनुमद्भुजङ्गप्रयातं प्रभाते
    प्रदोषेऽपि वा चार्धरात्रेऽप्यमर्त्यः ।
    पठन्नश्नतोऽपि प्रमुक्ताघजालं
    सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रियाति ॥ १६ ॥

     अर्थ

    “मैं हनुमान जी की स्तुति करता हूँ, जिनका व्यक्तित्व प्रफुल्लित, सुनहरे शरीर जैसा तेजस्वी है; जिनका साहस हिमशिखर समान दृढ़ एवं जो संसार में भय दूर करने वाले हैं; जिनकी शक्ति घास जैसी छोटी चीजों के कारण भी जगमगाती है; वह वायु पुत्र, पवित्रता में भी मित्रस्वरूप हैं।”

     

    “मैं सभी के भीतर निवास करने वाले, पावन भावों के आदिकर्ता, बाल-सूर्य जैसे तेज वाले, चन्द्रमा, कुमुद-फूल और मंदार फूल-क्षम मुस्कान वाले, और रामराजा के सदा सेवक हनुमान जी की भक्ति करता हूँ।”

     

    “मैं उनका वंदन करता हूँ, जिन्होंने लक्षणों की रक्षा में निपुणता, देवी-देवताओं को प्रसन्न करने वाली वाणी, भयंकर युद्धों में जिसने सीमाओं को भेद दिया, और राम के नाम से प्राप्त रक्षा की प्राप्ति की।”

     

    “कीधे भय दूर करने वाले, जिन्होंने पार्थिव पादों से भूख-भय मिटाए; घने बालों से ढकी कमर, मजबूत घुटने, उग्र केश, भुजा से चट्टान सी लाठी उठाई; जयश्री के साथ हनुमत रामदूत का मैं वंदन करता हूँ।”

     

    “मैं वंदन करता हूँ उस अंजनेय जी का, जिनकी गति तेज, चलन अद्भुत, हरिण-नाद जैसा गर्जन, कठोर हँसी, सिंह नाद जैसे दो शाखाओं के साथ हैं; जिन्होंने त्रिलोक को कंपन कर दिया।”

     

     

    “मैं पूजता हूँ उन्हें रण-भूमि के भीषण, मेघनाद जैसे गर्जना-मय, मित्रों के मार्ग पर खग-घन-सुरों को भी चकित करते हुए हनुमान जी।”

     

    “मैं उनकी स्तुति करता हूँ, जिनकी पिंगल (भूरी) नयन शक्ति-सम्मिलित हैं; जघन्य दन्त-रूप, भीषण दन्त; घोर गम्भीरता से असुरों के भय और भावों को दूर करते हैं।”

     

     

    “मैं नमस्कर करता हूँ उस कपिश्रेष्ठ रामप्रिय को, जो गर्भ, तप, रोग व तीव्र पीड़ाओं को त्वरित दूर करता है और उसके चरणद्वारा भक्तों के मन को लगाता है।”

     

     

    “हे मेरे दयालु प्रभु श्रीहनुमंत! जिसे जन्म-अवस्था से लेकर अनेक दुखों का भार सहना पड़ा, आप मेरे चरण-भक्ति-मनोभाव पर कृपा करें, क्योंकि आप बड़े बालक बनकर भी सम्पूर्ण प्रतिष्ठा वाले हैं।”

     

     

    “आपकी योग-सम्पन्नता ऐसी है कि ब्रह्मा व रूद्र जैसे अज्ञानियों को भी राम का रहस्य नहीं पता; ऐसे अनोखे रूप को मैं नमस्कार करता हूँ, हे वानरों के अधिपति!”

     

    “आपको मेरा नमन, हे महा-निष्ठा के वाहक, महावज्र-देह, प्रदीयमान सूर्य, विषयों के कर्ता।”

     

     

    आपको नमन, हे सनातन ब्रह्मचर्यधारी, वायुपुत्र, पिंगलाक्ष, और अनंतकाल तक रामभक्त।।” 

     

     

    “जो भी प्रत्येक सुबह, संध्या या मध्यरात्रि (या भोजन के समय) यह हनुमान भुजङ्ग स्तोत्र पढ़ता है, वह सारे बंधनों—रोग, भय, बाधा—से मुक्त होकर सदैव रामभक्त कहलाता है।”

     

    Hanuman Bhujanga Stotram

    In Devanāgarī: (Śrīmad Añjaneya Bhujanga Prayāta Stotram)

    In Sanskrit‑Roman: Shrīmad Anjaneya Bhujanga Prayāta Stotram

    In popular usage: Āñjaneya Bhujanga Stotram (“Anjaneya’s Snake‑meter Hymn”) Hanumat Bhujanga Prayāta Stotram (“Hanumat’s Composed Hymn in Snake‑Meter”)

    Hanuman Bhujanga Stotram

    🧠1. Author & Time of Composition

    • Traditionally, this hymn is attributed to Adi Shankaracharya.
    • Scholars note that it does not appear in his standard corpus of works, so it is likely one of his less widely circulated compositions.

    🏞️2. Legend of its Composition (Rachana‑Parishthiti)

    • According to legend, Shankaracharya visited the Subrahmanya (Murugan) temple at Tiruchendur. While inside, two snakes constricted around him.
    • Instantly, he composed this hymn. After completing just two verses, the snakes slithered away—one leaving, the other disappearing into the temple.

    📜3. Structure & Theme of the Stotram

    –  It is composed in the Bhujanga-chhanda (snake meter), hence named “Bhujanga Prayāta.” This meter mimics the movement of a serpent.

    –  The stotram typically contains around 19 verses, praising Lord Hanuman’s divine form, strength, and devotional qualities.

    Shriparni Vastu Brahma Nabhi or Vaastu Brahma Shanku
    Shriparni Vastu Brahma Nabhi or Vaastu Brahma Shanku
    Shop Now
    Golden Meru Shriparni Shreeyantra
    Golden Meru Shriparni Shreeyantra
    ₹4099₹2230
    Shop Now
    Auspicious Sriparni Wooden Wealth Money Cash Box (Size 10 x 5.5 x 4 inches)
    Auspicious Sriparni Wooden Wealth Money Cash Box (Size 10 x 5.5 x 4 inches)
    Shop Now
    Shriparni Shriyantra Vastu Pyramid Wooden Yantra
    Shriparni Shriyantra Vastu Pyramid Wooden Yantra
    ₹2099₹772
    Shop Now
    Wooden Lotus Kamal Aasan
    Wooden Lotus Kamal Aasan
    Shop Now
    Vastu Shriparni Wooden Pyramid with Base (3 inch)
    Vastu Shriparni Wooden Pyramid with Base (3 inch)
    ₹2095₹700
    Shop Now

    Related Post

    देवनागरी में :श्रीमदाञ्जनेयभुजङ्गप्रयातस्तोत्रम्

    संस्कृत-रोमन में : Shrīmad Anjaneya Bhujanga Prayāta Stotram

    इसे लोकप्रिय रूप में “आञ्जनेय भुजङ्ग स्तोत्रम्” या “हनुमत् भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम्” भी कहा जाता है

    Hanuman Bhujanga Stotram

    🧠 1. रचयिता एवं समय

    • परंपरागत रूप से इसे आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है
    • हालांकि, यह शंकर की मुख्य रचनाओं की सूची में नहीं मिलता, अतः कुछ विद्वान इसे उनके अप्रचलित ग्रंथों में से मानते हैं

    🏞 2. रचना‑परिस्थिति की कथा

    • एक किंवदंती अनुसार शंकराचार्य जब तिरुचेंदुर स्थित Subrahmanya (मुरुगन) मंदिर गए थे, तब दो साँपों ने उन्हें जकड़ लिया।
    • उस समय उन्होंने तत्काल इस स्तोत्र की रचना की — दो श्लोकों का जाप करते ही साँप उतर गए और एक मंदिर के भीतर गायब हो गया

    📜 3. स्तोत्र का स्वरूप

    –  यह भुजंग‑छंद  में लिखा गया है — “भुजङ्गप्रयात” नाम इसी छंद से जुड़ा है

    –  इसमें लगभग 19 श्लोक होते हैं, जिनमें हनुमान जी के दिव्य रूप, शक्ति और भक्तिमय गुणों का स्तवन है

     ॥ आञ्जनेय भुजङ्ग स्तोत्रम् ॥

    प्रपन्नानुरागं प्रभाकाञ्चनाभं
    जगद्भीतिशौर्यं तुषाराद्रिधैर्यम् ।
    तृणीभूतहेतिं रणोद्यद्विभूतिं
    भजे वायुपुत्रं पवित्राप्तमित्रम् ॥ १ ॥

    भजे पावनं भावनानित्यवासं
    भजे बालभानु प्रभाचारुभासम् ।
    भजे चन्द्रिकाकुन्द मन्दारहासं
    भजे सन्ततं रामभूपाल दासम् ॥ २ ॥

    भजे लक्ष्मणप्राणरक्षातिदक्षं
    भजे तोषितानेक गीर्वाणपक्षम् ।
    भजे घोरसङ्ग्राम सीमाहताक्षं
    भजे रामनामाति सम्प्राप्तरक्षम् ॥ ३ ॥

    कृताभीलनादं क्षितिक्षिप्तपादं
    घनक्रान्त भृङ्गं कटिस्थोरु जङ्घम् ।
    वियद्व्याप्तकेशं भुजाश्लेषिताश्मं
    जयश्री समेतं भजे रामदूतम् ॥ ४ ॥

    चलद्वालघातं भ्रमच्चक्रवालं
    कठोराट्टहासं प्रभिन्नाब्जजाण्डम् ।
    महासिंहनादा द्विशीर्णत्रिलोकं
    भजे चाञ्जनेयं प्रभुं वज्रकायम् ॥ ५ ॥

    रणे भीषणे मेघनादे सनादे
    सरोषे समारोपिते मित्रमुख्ये ।
    खगानां घनानां सुराणां च मार्गे
    नटन्तं वहन्तं हनूमन्त मीडे ॥ ६ ॥

    कनद्रत्न जम्भारि दम्भोलिधारं
    कनद्दन्त निर्धूतकालोग्र दन्तम् ।
    पदाघातभीताब्धि भूतादिवासं
    रणक्षोणिदक्षं भजे पिङ्गलाक्षम् ॥ ७ ॥

    महागर्भपीडां महोत्पातपीडां
    महारोगपीडां महातीव्रपीडाम् ।
    हरत्याशु ते पादपद्मानुरक्तो
    नमस्ते कपिश्रेष्ठ रामप्रियोयः ॥ ८ ॥

    जराभारतो भूरि पीडां शरीरे
    निराधारणारूढ गाढ प्रतापी ।
    भवत्पादभक्तिं भवद्भक्तिरक्तिं
    कुरु श्रीहनूमत्प्रभो मे दयालो ॥ ९ ॥

    महायोगिनो ब्रह्मरुद्रादयो वा
    न जानन्ति तत्त्वं निजं राघवस्य ।
    कथं ज्ञायते मादृशे नित्यमेव
    प्रसीद प्रभो वानरेन्द्रो नमस्ते ॥ १० ॥

    नमस्ते महासत्त्ववाहाय तुभ्यं
    नमस्ते महावज्रदेहाय तुभ्यम् ।
    नमस्ते परीभूत सूर्याय तुभ्यं
    नमस्ते कृतामर्त्य कार्याय तुभ्यम् ॥ ११ ॥

    नमस्ते सदा ब्रह्मचर्याय तुभ्यं
    नमस्ते सदा वायुपुत्राय तुभ्यम् । 
    नमस्ते सदा पिङ्गलाक्षाय तुभ्यं
    नमस्ते सदा रामभक्ताय तुभ्यम् ॥ १२ ॥

    हनुमद्भुजङ्गप्रयातं प्रभाते
    प्रदोषेऽपि वा चार्धरात्रेऽप्यमर्त्यः ।
    पठन्नश्नतोऽपि प्रमुक्ताघजालं
    सदा सर्वदा रामभक्तिं प्रियाति ॥ १६ ॥

     अर्थ

    “मैं हनुमान जी की स्तुति करता हूँ, जिनका व्यक्तित्व प्रफुल्लित, सुनहरे शरीर जैसा तेजस्वी है; जिनका साहस हिमशिखर समान दृढ़ एवं जो संसार में भय दूर करने वाले हैं; जिनकी शक्ति घास जैसी छोटी चीजों के कारण भी जगमगाती है; वह वायु पुत्र, पवित्रता में भी मित्रस्वरूप हैं।”

     

    “मैं सभी के भीतर निवास करने वाले, पावन भावों के आदिकर्ता, बाल-सूर्य जैसे तेज वाले, चन्द्रमा, कुमुद-फूल और मंदार फूल-क्षम मुस्कान वाले, और रामराजा के सदा सेवक हनुमान जी की भक्ति करता हूँ।”

     

    “मैं उनका वंदन करता हूँ, जिन्होंने लक्षणों की रक्षा में निपुणता, देवी-देवताओं को प्रसन्न करने वाली वाणी, भयंकर युद्धों में जिसने सीमाओं को भेद दिया, और राम के नाम से प्राप्त रक्षा की प्राप्ति की।”

     

    “कीधे भय दूर करने वाले, जिन्होंने पार्थिव पादों से भूख-भय मिटाए; घने बालों से ढकी कमर, मजबूत घुटने, उग्र केश, भुजा से चट्टान सी लाठी उठाई; जयश्री के साथ हनुमत रामदूत का मैं वंदन करता हूँ।”

     

    “मैं वंदन करता हूँ उस अंजनेय जी का, जिनकी गति तेज, चलन अद्भुत, हरिण-नाद जैसा गर्जन, कठोर हँसी, सिंह नाद जैसे दो शाखाओं के साथ हैं; जिन्होंने त्रिलोक को कंपन कर दिया।”

     

     

    “मैं पूजता हूँ उन्हें रण-भूमि के भीषण, मेघनाद जैसे गर्जना-मय, मित्रों के मार्ग पर खग-घन-सुरों को भी चकित करते हुए हनुमान जी।”

     

    “मैं उनकी स्तुति करता हूँ, जिनकी पिंगल (भूरी) नयन शक्ति-सम्मिलित हैं; जघन्य दन्त-रूप, भीषण दन्त; घोर गम्भीरता से असुरों के भय और भावों को दूर करते हैं।”

     

     

    “मैं नमस्कर करता हूँ उस कपिश्रेष्ठ रामप्रिय को, जो गर्भ, तप, रोग व तीव्र पीड़ाओं को त्वरित दूर करता है और उसके चरणद्वारा भक्तों के मन को लगाता है।”

     

     

    “हे मेरे दयालु प्रभु श्रीहनुमंत! जिसे जन्म-अवस्था से लेकर अनेक दुखों का भार सहना पड़ा, आप मेरे चरण-भक्ति-मनोभाव पर कृपा करें, क्योंकि आप बड़े बालक बनकर भी सम्पूर्ण प्रतिष्ठा वाले हैं।”

     

     

    “आपकी योग-सम्पन्नता ऐसी है कि ब्रह्मा व रूद्र जैसे अज्ञानियों को भी राम का रहस्य नहीं पता; ऐसे अनोखे रूप को मैं नमस्कार करता हूँ, हे वानरों के अधिपति!”

     

    “आपको मेरा नमन, हे महा-निष्ठा के वाहक, महावज्र-देह, प्रदीयमान सूर्य, विषयों के कर्ता।”

     

     

    आपको नमन, हे सनातन ब्रह्मचर्यधारी, वायुपुत्र, पिंगलाक्ष, और अनंतकाल तक रामभक्त।।” 

     

     

    “जो भी प्रत्येक सुबह, संध्या या मध्यरात्रि (या भोजन के समय) यह हनुमान भुजङ्ग स्तोत्र पढ़ता है, वह सारे बंधनों—रोग, भय, बाधा—से मुक्त होकर सदैव रामभक्त कहलाता है।”

     

    Hanuman Bhujanga Stotram

    In Devanāgarī: (Śrīmad Añjaneya Bhujanga Prayāta Stotram)

    In Sanskrit‑Roman: Shrīmad Anjaneya Bhujanga Prayāta Stotram

    In popular usage: Āñjaneya Bhujanga Stotram (“Anjaneya’s Snake‑meter Hymn”) Hanumat Bhujanga Prayāta Stotram (“Hanumat’s Composed Hymn in Snake‑Meter”)

    Hanuman Bhujanga Stotram

    🧠1. Author & Time of Composition

    • Traditionally, this hymn is attributed to Adi Shankaracharya.
    • Scholars note that it does not appear in his standard corpus of works, so it is likely one of his less widely circulated compositions.

    🏞️2. Legend of its Composition (Rachana‑Parishthiti)

    • According to legend, Shankaracharya visited the Subrahmanya (Murugan) temple at Tiruchendur. While inside, two snakes constricted around him.
    • Instantly, he composed this hymn. After completing just two verses, the snakes slithered away—one leaving, the other disappearing into the temple.

    📜3. Structure & Theme of the Stotram

    –  It is composed in the Bhujanga-chhanda (snake meter), hence named “Bhujanga Prayāta.” This meter mimics the movement of a serpent.

    –  The stotram typically contains around 19 verses, praising Lord Hanuman’s divine form, strength, and devotional qualities.

    Save to Wishlist

    Please sign in to save products to your wishlist.

    Lost your password?

      Your Order and Tracking details will be shared on this number.

      Reset Password

      Enter your registered email address and we'll send you a reset link.